
हॉकी का हाल बेहाल , है मेरा ये सवाल है ? कहाँ थे हॉकी का गेम बजाने वाले वो तमाम धुरंदर जो राष्ट्रीय खेल की अस्मिता पर उठते तमाम घातक सवालों से लापरवाह कुम्भकरण की नींद सोते रहे थे?
हॉकी खिलाडियों को nahi milte मेहनताने के बारे में पहले से नहीं जानते थे? और अगर अवगत थे तो आखिर किस बात का इन्तजार कर रहे थे? खिलाडियों के विद्रोह का या हॉकी इंडिया, खेल मंत्री एमएसगिल या मीडिया में तमाशे का इन्तजार था।
ये सच है की सहारा इंडिया के साथ हॉकी का आर्थिक अनुबंध हॉकी खिलाड़ियों और हॉकी प्रबंध के खर्च को उठाने में अक्षम है जो कि महज ३ करोर का है । आज हालत ये हो गए कि पिछले दिनों अर्जेंटीना में खेले गए मैच का पैसा तक खिलाड़ियों को नहीं मिला थाहॉकी खिलाड़ी को एक पूरी सीरीस खेलने का महज २५००० दिया जाता है वंही दूसरी ओर देश का धर्म बन चुके क्रिकेट में खिलाडी को सिर्फ एक मैच खेलने का १५०००० और टेस्ट मैच का २५०००० दिया जाता ही।
आखिर हॉकी खिलाड़ी अपनी बदहाली को कबतक छिपाते और गुस्से का ज्वारभाटा फूटना ही था सो फूटा ।
सवाल एक और है भारत में जिस चीज़ के साथ "राष्ट्रीय" शब्द जुड़ा है उस चीज़ का बेड़ा गरक आखिर क्यों हो गया है? जेसे राष्ट्रीय पशु बाघ की घटी संख्या हो या राष्ट्रीय गीत पर हालही में उठा विवाद, राष्ट्रीय पक्षीमौर की खस्ता हालत हो या राष्ट्रीय खेल हॉकी की फटीचर हालत पर उठा ये विवाद।
क्या इसकी एक वजह सरकारी लापरवाही है या प्रशानिक भ्रष्टाचारी का रिजल्ट है? ये अपने आप ने बहस का मुद्दा है लेकिन इतना तो साफ़ हे की सरकार की आँख तब तक नहीं खुलती जबतक कोई बड़ा धमाका नहीं होता।
इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा की हॉकी खिलाडियों का अपनी मेहनत के लिए विद्रोह बिलकुल सही था।
आज media me आई खबर के अनुसार भारत में ओलंपिक प्रमुख सुरेश कलमाड़ी ने खिलाड़ियों को मुज्बानी आश्वाशन की जमापूंजी दी ही और एक बार फिर खिलाडिओं को जुबानी आश्वाशन का लोलिपौप देकर फुसला दिया गया हे।
ऐसे में खिलाडियों का पूरा अभियान निरर्थक सा साबित लगने लगा हे।
अगर सरकार खिलाड़ियों के लिए कुछ नहीं कर सकती को निजी उद्योगपतियों और धन्नासेठो को खिलाड़ियों की मदद के लिए आगे आना चाहिये ।




