शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

गड़े मुर्दे उखाड़ना कितना सही है?


हम तो टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा जिन्दों को मुर्दा और मुर्दों को कब्र से उखाड़ खबरों के बाज़ार में बेचेगा कौन साला मेरा कुछ बिगाड़ सकता है।

कुछ इसी अंदाज़ में आज देश का मीडिया रुचिका गिरिहोत्रा की बोली लगा रहा है। आपको याद होगा कि आरुशी हत्याकांड हो या जेसिकालाल कि हत्या ने मीडिया का बाज़ार कितना कितने दिनों तक रोशन किया था , मतलब यह है की रुचिका हत्याकांड हाईप्रोफाइल केसों की चेनमें महज एक नई कड़ी है इससे ज्यादा कुछ नहीं। अब लगातार कई हफ्तों के लिए मीडिया की भूक शांत हो जाएगी और उसके बाद फिर से किसी नई रुचिका और आरुशी की तलाश शुरू होगी ...


प्रशन ये भी उठता है की क्या सचमुच मीडिया लोकतंत्र में घटने वाली सभी छोटी बड़ी घटनायों के लिए उतनी दर्यादिल हो गई है ?

शायद नहीं क्योंकि देश में रोज़ कई मासूमो के साथ बलात्कार भी होते हैं और महिलयों की हत्या भी लेकिन मीडिया की चमत्कारी नज़र में वो आ ही नहीं पाती या मीडिया उन्हें खबर बनाना ही नहीं चाहती है ऐसी खबरे भला मीडिया के टीआरपी के पैमाने पर खरी नहीं उतरती होंगी शायद ।


रुचिका को मरने के बाद इन्साफ मिले इसमें कोई बुरे नहीं है मगर उन हज़ारो रुचिकाओं का क्या होगा जो अभी जिन्दा हैं और अपने लिए इन्साफ की आस लगाये वक़्त के साथ बूढी होती जा रही है ?


शायद ये मीडिया का दोष है साथ ही हमारी लापरवाही का नतीजा भी की हम मीडिया की दिखाई हर तस्वीर को सच मानते हैं और हर छापी खबर को भगवान् की वाणी ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. समाज़ की दशा-दिशा पर एकदम सही चोट करता लेख

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  2. हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अगर समुदायिक चिट्ठाकारी में रूचि हो तो यहाँ पधारें http://www.janokti.blogspot.com . और पसंद आये तो हमारे समुदायिक चिट्ठे से जुड़ने के लिए मेल करें janokti@gmail.com
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    जयराम "विप्लव"
    Editor
    http://www.janokti.com/

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  3. बिल्कुल सही कहा आपने, हिन्दी ब्लोगिंग में आपका स्वागत है ।

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